Wednesday, January 4, 2012

                        गणपतिस्तोत्रम्

सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकाङ्कुशं वरप्रदाभयप्रदम्।
चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम्॥
किरीटहारकुण्डलं प्रदीप्तबाहुभूषणं प्रचण्डरत्‍‌नकङ्कणं प्रशोभिताङ्घियष्टिकम्।
प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं सरत्‍‌नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम्॥
सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं गृहप्रदेन्दुसुन्दरं युगक्षणप्रमोदितम्।
कवीन्द्रचित्तरञ्जकं महाविपत्तिभञ्जकं षडक्षरस्वरूपिणं भजे गजेन्द्ररूपिणम्॥
विरिञ्चविष्णुवन्दितं विरूपलोचनस्तुतं गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं पराम्बया।
निरन्तरं सुरासुरै: सपुत्रवामलोचनै: महामखेष्टकर्मसु स्मृतं भजामि तुन्दिलम्॥
मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं प्रबुद्धचित्तरञ्जकं प्रमोदकर्णचालकम्।
अनन्यभक्तिमानवं प्रचण्डमुक्तिदायं नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकम्॥
दारिद्रयविद्रावणमाशु कामदं स्तोत्रं पठेदेतदजस्त्रमादरात्।
पुत्री कलत्रस्वजनेषु मैत्री पुमान् भवेदेकवरप्रसादात्॥



अर्थ :- जो सुवर्ण के समान गौर वर्ण से सुन्दर प्रतीत होते हैं; एक ही श्वेत दन्त के द्वारा मनोहर जान पडते हैं; जिन्होंने हाथों में पाश और अङ्कुश ले रखे हैं; जो वर तथा अभय प्रदान करनेवाले हैं; जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं; जो सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं और प्रफुल्ल कमल के आसन पर बैठते हैं, उन गजानन का मैं भजन करता हूँ। जो किरीट, हार और कुण्डल के साथ उद्दीप्त बाहुभूषण धारण करते हैं; चमकीले रत्‍‌नों का कंगन पहनते हैं; जिनके दण्डोपम चरण अत्यन्त शोभाशाली हैं, जो प्रभातकाल के सूर्य के समान सुन्दर और लाल दो वस्त्र धारण करते हैं तथा जिनके युगल चरणारविन्द रत्‍‌नजटित सुवर्णनिर्मित नुपूरों से सुशोभित हैं, उन गणेशजी का मैं भजन करता हँू। जिनका विशाल एवं मनोहर चँवर सुवर्णमय दण्ड से मण्डित है; जो सकाम भक्तों को गृह-सुख प्रदान करनेवाले एवं चन्द्रमा के समान सुन्दर हैं; युगों में क्षण का आनन्द लेनेवाले हैं; जिनसे कवीश्वरों के चित्त का रञ्जन होता है; जो बडी-बडी विपत्तियों का भञ्जन करनेवाले और षडक्षर मन्त्रस्वरूप हैं, उन गजराजरूपधारी गणेश का मैं भजन करता हूँ। ब्रह्मा और विष्णु जिनकी वन्दना तथा विरूपलोचन शिव जिनकी स्तुति करते हैं; जो गिरीश (शिव) के दर्शन की इच्छा से परा अम्बा पार्वती द्वारा समर्पित हैं; देवता और असुर अपने पुत्रों और वामलोचना पत्‍ि‌नयों के साथ बडे-बडे यज्ञों तथा अभीष्ट कर्मो में निरन्तर जिनका स्मरण करते हैं; उन तुन्दिल देवता गणेश का मैं भजन करता हूँ। जिनकी मदराशिपर लुभाये हुए चञ्चल भ्रमर मञ्जु गुञ्जारव करते रहते हैं; जो ज्ञानीजनों के चित्त को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं; अपने कानों को सानन्द हिलाया करते हैं और अनन्य भक्ति रखनेवाले मनुष्यों को उत्कृष्ट मुक्ति देनेवाले हैं, उन वक्रतुण्ड गणनायक का मैं प्रतिदिन आदरपूर्वक भजन करता हूँ। यह स्तोत्र दरिद्रता को शीघ्र भगानेवाला और अभीष्ट वस्तु को देनेवाला है। जो निरन्तर आदरपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह मनुष्य एकेश्वर गणेश की कृपा से पुत्रवान् तथा स्त्री एवं स्वजनों के प्रति मित्रभाव से युक्त होगा।
-----
स्त्रोत :- यह गणपतिस्तोत्र श्री शंकराचार्यद्वारा विरचित है।





       श्रीशिवा-शिव द्वारा श्रीगणेश का गुणगान
श्रीशक्तिशिवावूचतु:
नमस्ते गणनाथाय गणानां पतये नम:। भक्तिप्रियाय देवेश भक्तेभ्य: सुखदायक॥
स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च। नाभिशेषाय देवाय ढुण्ढिराजाय ते नम:॥
वरदाभयहस्ताय नम: परशुधारिणे। नमस्ते सृणिहस्ताय नाभिशेषाय ते नम:॥
अनामयाय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नम:। सगुणाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे निर्गुणाय च॥
ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च गजानन नमोऽस्तु ते। आदिपूज्याय ज्येष्ठाय ज्येष्ठराजाय ते नम:॥
मात्रे पित्रे च सर्वेषां हेरम्बाय नमो नम:। अनादये च विघन्ेश विघन्कत्र्रे नमो नम:॥
विघन्हत्र्रे स्वभक्तानां लम्बोदर नमोऽस्तु ते। त्वदीयभक्तियोगेन योगीशा: शान्तिमागता:॥
किं स्तुवो योगरूपं तं प्रणमावश्च विघन्पम्। तेन तुष्टो भव स्वामिन्नित्युक्त्वा तं प्रणेमतु:॥
तावुत्थाप्य गणाधीश उवाच तौ महेश्वरौ॥
श्रीगणेश उवाच
भवत्कृतमिदं स्तोत्रं मम भक्तिविवर्धनम्।
भविष्यति च सौख्यस्य पठते श्रृण्वते प्रदम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव पुत्रपौत्रादिकंतथा॥
धनधान्यादिकं सर्व लभते तेन निश्चितम्॥

अर्थ :- श्रीशक्ति और शिव बोले - भक्तों को सुख देनेवाले देवेश्वर! आप भक्तिप्रिय हैं तथा गणों के अधिपति हैं; आप गणनाथ को नमस्कार है। आप स्वानन्दलोक के वासी और सिद्धि-बुद्धि के प्राणवल्लभ हैं। आपकी नाभि में भूषणरूप से शेषनाग विराजते हैं; आप ढुण्ढिराज देवको नमस्कार है। आपके हाथों में वरद और अभय की मुद्राएँ हैं। आप परशु धारण करते हैं। आपके हाथ में अङ्कुश शोभा पाता है और नाभि में नागराज; आपको नमस्कार है। आप रोगरहित, सर्वस्वरूप और सबके पूजनीय हैं; आपको नमस्कार है। आप ही सगुण और निर्गुण ब्रह्म हैं; आपको नमस्कार है। आप ब्राह्मणों को ब्रह्म (वेद एवं ब्रह्म-तत्त्‍‌व का ज्ञान) देते हैं; गजानन! आपको नमस्कार है। आप प्रथम पूजनीय, ज्येष्ठ (कुमार कार्तिकेय के बडे भाई) और ज्येष्ठराज हैं; आपको नमस्कार है। सबके माता और पिता आप हेरम्ब को बारम्बार नमस्कार है। विघन्ेश्वर! आप अनादि और विघनें के भी जनक हैं; आपको बार-बार नमस्कार है। लम्बोदर! आप अपने भक्तों का विघन् हरण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। योगीश्वरगण आपके भक्तियोग से शान्ति को प्राप्त हुए हैं। योगस्वरूप आपकी हम दोनों क्या स्तुति करें। आप विघन्राज को हम दोनों प्रणाम करते हैं। स्वामिन्! इस प्रणाममात्र से आप संतुष्ट हों।

ऐसा कहकर शिवा-शिव ने गणेशजी को प्रणाम किया। तब उन दोनों को उठाकर गणाधीश ने कहा-आप दोनों द्वारा किया गया यह स्तवन मेरी भक्ति को बढानेवाला है। जो इसका पठन और श्रवण करेगा, उसके लिये यह सौख्यप्रद होगा। इसके अतिरिक्त यह भोग और मोक्ष तथा पुत्र और पौत्र आदि को भी देनेवाला होगा। मनुष्य इस स्तोत्र के द्वारा धन-धान्य आदि सभी वस्तुएँ निश्चितरूप से प्राप्त कर लेता है।  ( दैनिक जागरण )







No comments:

Post a Comment